यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Thursday, 2 July, 2009

विशेष कानून : अगाथा ने भी मिलाया शर्मिला से सुर

पूर्वोत्तर की दो शीर्ष महिलाएं आपस में मिलीं. दोनों ने एक-दूसरे के दुख-दर्द बांटे थे. कई दिनों से आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट-1958 के चलते मणिपुर में व्याप्त आशांति का जायजा लेने केंद्र की सबसे युवा सांसद अगाथा संगमा पिछले दिनों तीन दिनों की यात्रा पर मणिपुर आई थी. जेएन अस्पताल के विशेष तौर पर सुरक्षित वार्ड में इस एक्ट के विरोध में जिंदगी और मौत से लड़ रही इराम शर्मिला से मुलाकात की.



इस मुलाकात में शर्मिला ने मणिपुर से यह कानून हटाने में अगाथा की मदद की आस लगाई. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को रद्द करवाने को लेकर पिछले आठ साल से अनसन पर बैठी इरोम शर्मिला से मुलाकात के बाद पत्रकारों को संबोधित करती हुई अगाथा ने कहा कि इस काले कानून को रद्द करने को केंद्र सरकार से वह मांग जरूर करेंगी. उन्होंने कहा कि वह जनता को आश्वाशन देती हैं कि जितना हो सके, इस मुद्दे को प्राथमिकता देंगी. उसके कुछ ही समय बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस मसले पर मुलाकात कर अनशन पर बैठी शर्मिला को बचाने की अपील की. उनकी इस मुलाकात से प्रदेश की जनता को उम्मीद है कि पिछले कई सालों से प्रदेश में इस कानून के सहारे जो मनमानी की जा रही है, उसका अंत होगा. यूपीए सरकार की सबसे युवा मंत्री अगाथा संगमा ने लिखित ज्ञापन देकर शर्मिला की जिंदगी बचाने की मांग की.
अगाथा की इस मुलाकात से प्रदेश में कई सालों से आस लगा रही जनता को उम्मीद की नई किरण दिखी हैं. इसकी वजह यह है कि कई सालों से शर्मिला के इस संघर्ष को किसी राजनेता या किसी अधिकारी ने न तो जानने की कोशिश की और न ही इस मामले का जायजा लिया. इस मसले पर केंद्र सरकार ने हर वक्त कठोर कदम उठाए हैं. केंद्र यह मानने को तैयार नहीं है कि पूर्वोत्तर राज्यों से विशेष सशस्त्र बल कानून हटाया जाए. इस मामले को लेकर राज्य सरकार का रुख भी वैसा ही है, जैसा केंद्र का है. राज्य सरकार कई मुद्दों पर मजबूर हो जाती है और केंद्र के इशारों का इंतजार करती रहती है.



मणिपुर की जनता तो इस कानून को जंगल का कानून मानती है, जिसके मुताबिक कभी भी किसी को मार गिराया जा सकता है. इस कानून को लोग बेहद खराब नजर से देखते हैं. 2004 में कथित तौर पर असम रायफल्स के जवानों ने सामाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी की हवालात में बलात्कार के बाद हत्या कर दी थी. उसके विरोध में समूचे प्रदेष में आग लग गई, जो अभी भी सुलग रही है. इस कानून को लेकर शर्मिला का मानना है कि इस दुनिया में मनमानी से कोई किसी को मार नहीं सकता. यह सोचने-समझने वाले मनुष्य की दुनिया है, जानवारों को नहीं. शर्मिला देश के शासक वर्ग से यह सवाल पूछ रही है कि जंगलराज के भीतर कब तक आम आदमी बिना डर के जी सकता है? शर्मिला कहती हैं कि यह भूख-हड़ताल तभी खत्म होगी, जब सरकार वगैर किसी शर्त के आर्म्ड फोर्सेस स्पेच्चल पावर एक्ट को हटाएगी. आतंकवादी समस्या पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक आंतरिक और स्थाई समस्या है. इसके अलावा सबसे बड़ी समस्या है विशेष सशस्त्र बल कानून 1958, जिसको हथियार बनाकर आतंकवाद को कुचलने के नाम पर निर्दोष लोगों पर जुल्म हो रहे हैं. इससे आमजन का अमन-चैन छिन रहा है.
अगाथा की शर्मिला से मुलाकात को लोगों ने बहुत सराहा. मणिपुर की आम जनता ने इसके पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य न देख कर उनकी संजीदगी देखी. उनको ऐसा लगा कि परिवार की कोई बहन अपनी बड़ी बहन से मिल रही हो. गौरतलब है कि असम रायफल्स के जवानों ने 2000 में 10 निर्दोषों को मार दिया था. इसके विरोध में ही शर्मिला आमरण अनशन पर बैठ गई. उसी वक्त राज्य सरकार ने इंफाल शहर के कई विधानसभा क्षेत्रों से यह कानून हटा दिया था. केंद्र के मना करने के बावजूद मणिपुर सरकार ने एक प्रयोग के तौर पर कुछ खास इलाकों में इस एक्ट को रद्द करना शुरू किया था. कानून-व्यवस्था अगर दुरुस्त रही, तो इस एक्ट को अन्य जगहों से भी हटाने की घोषणा राज्य सरकार ने की. मगर शर्मिला ने इस एक्ट को राज्य से पूरी तरह से हटाने की मांग की. इस बात को लेकर वह अड़ी रहीं. उल्लेखनीय है कि कइस एक्ट के विरोध में मणिपुर से लेकर उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों और देच्च के कुछ हिस्सों में अप्रिय घटना घटने के बाद केंद्र सरकार ने जस्टिस जीवन रेड्डी के नेतृत्व में एक समिति बनाई. समिति ने भी इस एक्ट को आपत्तिजनक बताया था. दूसरी तरफ शर्मिला को बचाने के लिए पिछले छह महीने से शर्मिला बचाव समिति पीडीए कांप्लेक्स, इंफाल में अनशन कर रही है. इस अभियान में सिने एक्टर्स गिल्ड मणिपुर के सदस्यों ने भी जून 28 से शिरकत करने का फैसला किया. कुल मिला कर अगाथा संगमा की मणिपुर यात्रा और इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात से लगता है कि राज्य से इस काले कानून को हटा दिया जाएगा.

क्या है आर्म्ड फोर्स स्पेच्चल पावर एक्ट?

आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट को 11 सितंबर 1958 को संसद में पारित किया गया था. यह पूर्वोत्तर के राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा जैसे अच्चांत क्षेत्रों में सेना को विशेष ताकत देने के लिए पारित किया गया था.

यह कानून लागू होने वाले इलाके में सेना क्या-क्या कर सकती है.

1.भले ही मौत का कारण बने, फिर भी इसके तहत किसी पर देखते ही गोली चलाई जा सकती है.
2.इस एक्ट के अनुसार किसी को भी शक के आधार पर ही वारंट के बिना भी जबरदस्ती गिरफ्‌तार किया जा सकता है.
3.किसी को गिरफ्‌तार करने के लिए सेना किसी भी इलाके की तलाच्ची ले सकती है.

इस एक्ट के विरोध में कौन-कौन

पूरे देश के सौ से भी अधिक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और एच्चिया से भी आए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इंफाल में विरोध प्रदर्शन कर इस एक्ट को हटाने के लिए संघर्ष कर रही शर्मिला का समर्थन किया. भारत की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं इस एक्ट का समर्थन करती हैं. वे हैं - आशा परिवार, नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इंफोरमेच्चन, राइट टू फूड कैंपेन, असोसिएशन ऑफ पैरेंट्स ऑफ डिसअपियर परच्चंस, नेशनल कैंपेन फॉर दलित ह्‌यूमन राइट्स, एकता पीपल्स यूनियन ऑफ ह्‌यूमन राइट्स, इंसाफ लोकराज संगठन, हिंद नव जवान एकता सभा, ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमन असोसिएशन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन, फोरम फॉर डेमोक्रेटिक इनिसिएटिव्स और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी 'मार्क्सवादी-लेनिनवादी' आदि

विदेशों से भी समर्थन

केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के मानवाधिकार संगठनों और एनआरआई ने भी इस एक्ट का विरोध किया है. द पीस कॉलिच्चन ऑफ पीपल ऑफ साउथ एशिया, फ्रेंड्स ऑफ साउथ एशिया, एनआरआई फॉर ए सेकुलर एंड हारमोनिअस इंडिया, पाकिस्तान ऑर्गेनाइजेशंस, पीपल्स डेवलपमेंट फाउंडेशान, इंडस वैली थिएटर ग्रुप और इंस्टीट्यूट फॉर पीस एंड सेकुलर स्टडीज.

Sunday, 21 June, 2009

18 जून मणिपुर के इतिहास में एक यादगार दिन


केंद्र सरकार और एनएससीएन आईएम के बीच युद्ध विराम यानी सीज फायर की खबर जब मणिपुर पहुंची, उससे पहले से ही प्रदेश की जनता इस बात की उम्मीद लगा चुकी थी. 2001 के 18 जून को केंद्र सरकार और एनएससीएन आईएम के बीच युद्धविराम लागू कराने वाली जगहों को बढ़ाने में मणिपुर भी शामिल था. लेकिन यु+द्ध विराम हो, इससे पहले यह खबर इंफाल पहुंच गई. यह खबर पूरे राज्य में बवंडर की तरह फैल गई. मणिपुर की कई संस्थाओं ने इसे मानने से इंकार कर दिया. अमुको, एमसु, निपको, एमकिल, ईपसा, यूपीएफ आदि ने मिल कर इस निर्णय को वापस लेने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के इरादे से आम हड़ताल की घोषणा कर दी, जो 15 जून की रात से लागू होकर 18 जून तक चला. हड़ताल की शुरुआत में केंद्र के सत्ताधारियों सहित राज्य में शासन कर रहे नेताओं का पुतला दहन कर इन संस्थाओं ने अपना विरोध जताया. हड़ताल का चौथा दिन, 18 जून. यह दिन राज्य के इतिहास में काला दिन साबित हुआ. इस दिन में कई मासूमों की जान चली गई. इस दिन भोर में ग्रेटर इंफाल के इलाके में रहनेवाली जनता ने जगह-जगह नुक्कड़ पर इकट्ठा होकर बैठक करना शुरू किया. भारी तादाद में लोगों के सड़क पर निकलने से राज्य के बाकी हिस्से के लोग भी जोश से भर गए और निर्भय होकर अपने-अपने घरों से निकल पडे+. रक्षाकर्मियों ने भीड़ को भगाना शुरू किया. मगर लोग घर तो नहीं गये, हां और ज्यादा आक्रोच्च से जरूर भर गये. भीड़ और ज्यादा सड़को पर निकल आई.

भीड़ ने जनसैलाब की शक्ल अख्तियार कर ली. पुलिस ने उन पर काबू पाने के लिए टियर ग्यास और ब्लेंक फायर करना शुरू किया. आक्रोच्च से भरी भीड़ ने जवाबी हमला करते हुए पुलिस पर पत्थर फेंकना शुरू किया. विच्चाल संख्या में मौजूद पुलिस फोर्स ने भीड़ को नियंत्रित करने की नाकाम कोच्चिच्च की. लेकिन वांगखै और नोंगमैबुंग के रास्ते से आए लोग आगे बढ़ते-बढ़ते राज्यपाल के बंगले के सामने जा पहुंचे. उरिपोक, सगोलबंद और टिडीम रोड के रास्ते से आए लोग एक साथ होकर राज्यपाल बंगले के सामने जा धमके.

इतनी बड़ी तादाद में जमी भीड़ ने राज्यपाल से बात करने का प्रस्ताव रखा. बात करने का मौका न मिलने पर जनता और भी आक्रोच्चित हो गई. इतनी बड़ी भीड़ को रोकने की इन सेक्यूरिटी पार्सोनेल के पास शक्ति नहीं थी. और भीड़ थी कि लगातार बढ़ती ही जा रही थी. राजभवन के सामने होम मिनिस्टर और प्राइम मिनिस्टर का पुतला जलाया गया. आक्रोच्चित भीड़ ने राजनेताओं और उसके आवास को जलाकर राख कर दिया. विशेष बल आने पर भी स्थिति नियंत्रण नहीं हो पाई. गुस्साए लोगों ने कैशामपात स्थित मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी के ऑफिस को जला दिया. ऑफिस कंपलेक्स के अंदर स्थित कैंटिन भी जल कर राख हो गई. बीटी रोड स्थित मणिपुर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ऑफिस, रूपमहल टेंक स्थित समता पार्टी का ऑफिस और सीपीआई का ऑफिस आदि को भी जलाने की कोच्चिच्च की. पिपल्स रोड स्थित एमपीपी के ऑफिस भी जलाकर राख कर दिया. ऑफिस जलाने के बाद गुस्साए लोगों ने मणिपुर लेजिस्लेटिव असेंबली को निशाना बनाया और उसे जलाना शुरू किया.


इतना ही नहीं सीआरपीएफ से लैस मणिपुर के मुख्यमंत्री के बंगले के पश्चिम गेट को तोड़कर भीड़ अंदर घुस गई और तोड़-फोड़ मचा कर रख दिया. साथ में सामान को जलाने भी लगे. मुख्यमंत्री आवास के कंफरेंस हॉल और पड़ोसी कमरे जल कर राख हो गए. उस वक्त मुख्यमंत्री दिल्ली में थे. आगे एमएलए क्वार्टर में लोगों ने घुस कर यूनियन मिनिस्टर ऑफ स्टेट का
क्वार्टर, कई मंत्री के क्वार्टर और प्लानिंग विभाग के ऑफिस आदि एक-एक कर जला डाले.
जवाबी कार्रवाई करते हुए सीआरपीएफ ने भी अंधाधुंध गोली चलाई. उसमें 13 लोगों की मौत तत्काल घटना स्थल पर ही हो गई. शाम तक मरने वालों की संख्या 18 हो गई. मुख्यमंत्री का बंगला जलाने के बाद से ही सीआरपीएफ ने गोली चलाना शुरू कर दिया था. उस घटना में दो एक्स एमएलए जल मरे थे. साथ में और भी सरकारी संपत्तियां जलीं. इसके बाद मणिपुर घाटी के तीन जिले में कफ्‌र्यू लगा दिया गया. सड़क पर जो कोई भी दिखे, उसे गोली मारने का आदेच्च दे दिया गया.


इस तरह मणिपुर की अखंडता बचाने के लिए 18 जानों ने 18 जून 2001 को कुरबानी दे दी. अखंडता तोड़ने के बदले हम अपनी जान दे देंगे. शांति पसंद मणिपुर की जनता केंद्र सरकार को कई बार मणिपुर में सीज फायर लागू नहीं करवाने के लिए अपनी मांग प्रस्तुत कर चुकी है. बावजूद इसके केंद्र सरकार ने नगालैंड के साथ मिल कर सीज फायर एक्सटेंट करने की जो घोषणा की थी, उसी का नतीजा था 18 जून 2001 की यह अमानवीय घटना. हर साल 18 जून को लोग इसे एक सामाजिक पर्व की तरह मनाते हैं. इस दिन का इतिहास जब तक लोगों के दिलों में जिंदा रहेगा, तब तक मणिपुर के अखंडता कोई तोड़ नहीं सकता. इस विश्वास के साथ लोग इस दिन को एक लोकोत्सव की तरह मनाते हैं.

दिल्‍ली नहीं आना चाहिए था

पटना से एक पुराने मित्र दिल्‍ली आए थे. दिल्‍ली में शुरू में टिकने के लिए मुश्किलें सामना करना स्‍वाभाविक बात है. उसने पुराने मित्रों से संपर्क किया और उन लोगों के पास जाकर राय-परामर्श लिया. एक बुजुर्ग साथी ने उनसे कहा कि यार अभी दिल्‍ली नहीं आना चाहिए था तुमको. पटना में ही रहना चाहिए था. अभी तो मंडी का दौर है. मैं तो यही राय दूंगा कि आप पटना में ही रहिए. उस पुराने मित्र ने हमको फोन किया. आप कहां है. मैंने अपना पता बताया तो बोले कि मैं तुमसे मिलना चाहता हूं. मैंने कहा कि हम मिलते हैं कनाटप्‍लेस में. अगले दिन कनाटप्‍लेस में मिले रिगेल के सामने. सामने पार्क में बैठकर पुरानी यादों को ताजा किया. और दिल्‍ली के माहौल के बारे में बातचीत करने लगे. इस दरमियान उसने हमको पूरी कहानी बताई. मैं मन ही मन सोचने लगा कि जब आदमी संकट में पड जाते हैं तो उसकी मदद करने में क्‍यों लोग कंजुस करता है. मदद की बात तो छोडिए. कोई दिल्‍ली आकर नौकरी के बारे में राय परामर्श लेता है तो लोगों को ये लगता है कि नौकरी उनसे ही मांगने आ रहा है. और कहने लगता है कि यार तुमको दिल्‍ली आना नहीं चाहिए था. अभी समय खराब चल रहा है. अरे भैया कौन सा समय कब सही चलता है. मनके जीते जीत मनके हारे हार. आप अच्‍छे सोचते हैं तो अच्‍छा है. खराब सोचते हैं तो खराब. लोग खुद भी बढता नहीं है और दूसरों को भी बढने नहीं देता है. सामने कोई बढता है तो लोगों को अच्‍छा नहीं लगता. किसी को दिल्‍ली में आकर आपने आपको आगे बढाने के लिए कोशिश करना कितनी अच्‍छी बात है. खाली दिल्‍ली की बात नहीं है कोई भी बडे शहरों में जाकर खुद के और परिवार के लिए कुछ करना बहुत हिम्‍मत की बात तो है. हर आदमी से इस तरह नहीं होता है. दिल्‍ली में नौकरी का ऑप्‍सन जितना मिल रहा है उतना कोई और शहर में नहीं मिलता होगा. मेरा मानना है कि दिल्‍ली आना ही चाहिए था. मंडी में ही कीमत बढती है. लोग कहने लगता है कि मंडी का दौर चल रहा है. मंडी का दौर में ही नौकरी की तलाश आसानी होती है. मैं उम्‍मीद करता हूं कि लोग खुब संघर्ष करें. और आगे बढे.

मणिपुर में कांग्रेस ही कांग्रेस

मणिपुर में दोनों संसदीय सीटों पर कांग्रेस का कब्‍जा रहा. भीतरी मणिपुर इनर में डॉ टी मैन्‍य और बाहरी आउटर में थांगसो बाइटे ने सफलता हासिल की. यह मणिपुर के इतिहास में पहली बार हुआ है कि लोकसभा की दोनों सीटों पर कांग्रेस ने अपने पांव जमाए.

भीतरी यानी इनर की सीट पर निवर्तमान सांसद डॉ थोकचोम मैन्‍य ने अपने निकटतम प्रतिस्‍पर्धी सीपीआई के डॉ नर सिंह को 30960 वोट से परास्‍त किया. पूर्व केंद्रीय मंत्री एमपीपी के प्रत्‍याशी थौनाउजम चाउबा को 101787 वोट मिले, जबकि पूर्व मुख्‍यमंत्री और भाजपा के प्रत्‍याशी डब्‍ल्‍यू निपामचा को 34098 वोट ही मिले. निर्दलीय प्रत्‍याशियों में ए रहमन और एन होमेंद्रो को क्रमश: 13805 और 1450 वोट मिले. आरबीसीपी के प्रत्‍याशी एल क्षेत्रानी को 1290 वोट मिले. इनर के सफल प्रत्‍याशी डॉ मैन्‍य को पिछले लोकसभा चुनाव में 154055 वोट मिले थे, जबकि इस बार 76821 वोट अधिक मिले. डॉ मैन्‍य को सबसे ज्‍यादा वोट दिलाने वाला विधानसभा क्षेत्र अंद्रो है, जहां से 16280 वोट मिले. सबसे कम उनको शिंगजमै विधानसभा क्षेत्र से 2626 वोट मिले. सीपीआई को सबसे ज्‍यादा वोट लिलोंग विधानसभा क्षेत्र से 10898 मिले, जबकि सबसे कम 1618 वोट नंबोल से सीपीआई को मिले. जिला स्‍तर पर मतदान को देखें तो इंफाल (ईस्‍ट) में कांग्रेस को 79610 वोट और सीपीआई को 69212 इंफाल (वेस्‍ट) में कांग्रेस को 77765 सीपीआई को 75621, थौबाल जिले में कांग्रेस को 29330 और सीपीआई को 27845 और विष्‍णुपुर जिले में कांग्रेस को 44132 और सीपीआई को 27212 वोट मिले. बाहरी (आउटर) संसदीय सीट पर भी कांग्रेस के प्रत्‍याशी थांसो वाइटे ने पीडीए के प्रत्‍याशी और निवर्तमान सांसद मनि चरानमै को 119798 से भी ज्‍यादा वोट से हराया. वाइटे को कुल 388517 वोट मिले, जबकि मनि चरानमै को 224719 वोट मिले. आउटर में तीसरे स्‍थान पर बीजेपी के डी लोलि अदानि रहे, जिन्‍हें 93052 मत मिले, चौथे स्‍थान पर एनसीपी के एलबी सोना रहे, जिनको 79849 वोट मिले. आरजेडी के एमवाई हाउकिप को 4859, निर्दलीय वेली रोज को 4735, निर्दलीय एल गांते को 2070, एलजेपी के थांखानगिन को 1252 और निर्दलीय रोज मांस हाउकिप को 1128 वोट मिले. सांसद थांसो वाइटे को सबसे ज्‍यादा वोट साइकुल विधानसभा क्षेत्र से मिले, जहां उनको 27516 वोट मिले और सबसे कम यानी 850 मत माओ विधानसभा क्षेत्र से मिले. पीडीए के प्रत्‍याशी मनि चरानमै को सबसे ज्‍यादा 22194 वोट चिंगाई विधानसभा क्षेत्र से मिले और सबसे कम 106 वोट सुगनु विधानसभा क्षेत्र से ही मिले.

इस तरह मणिपुर के सभा सांसद कांग्रेस के हो गए हैं. गौरतलब है कि मणिपुर से राज्‍यसभा के रिशांग कैसिंग हैं, जो कांग्रेस के पुराने और बडे नेता हैं. और, इस बार लोकसभा के लिए चुने गए दोनों सदस्‍यों के भी कांग्रेसी होने से राज्‍य में कांग्रेस का पूरा वर्चस्‍व हो गया है. यही कारण है कि रिशांग कैसिंग ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से मांग की हे कि इस बार मणिपुर से भी किसी सांसद को केंद्र में मंत्री बनाया जाए.
बहरहाल, अब इन दोनों लोकसभा सदस्‍यों का सर्वप्रथम कार्य यही होगा कि आतंकवादी समस्‍या खत्‍म हो. दोबारा सांसद बने डॉ मैन्‍य ने तो जनता को यह आश्‍वासन भी दिया है कि उनकी प्राथमिकता प्रदेश में शांति व्‍यवस्‍था कायम करना है.

Monday, 20 April, 2009

मणिपुर में विकास है मुद्दा

मणिपुर में लोकसभा की केबल दो सीटें हैं. फिर भी यहां चुनाव दो चरणों में हो रहा है. 16 अप्रैल को पहले चरण में आउटर मणिपुर संसदीय सीट का चुनाव हो गया. लगभग आठ लाख 70 हजार मतदाताओं ने वोट डाले. चुनाव शांतिपूर्ण रहा. अब दूसरे चरण में 22 अप्रैल को दूसरी सीट अंदरी (इनर) मणिपुर के लिए मतदान होगा. पहले चरण के चुनाव में भी निष्‍पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए सुरक्षा के पुख्‍ता इंतजाम करने के आदेश जारी किए गए हैं.
30 लाख की आबादी वाले इस प्रदेश में दो संसदीय सीटें हैं- इनर और आउटर. आउटर के लिए पांच और इनर के लिए सात उम्‍मीदवार मैदान में हैं. इनर के सात उम्‍मीदवारों में निवर्तमान सांसद डॉ: टीएच मैन्‍य (कांग्रेस), टीएच चाउबा (मणिपुर पीपल्‍स पार्टी), डॉ: एन नर (सीपीआई), डब्‍ल्‍यू निपामाचा (भाजपा), एल क्षेत्रानी (बसपा) और दो निर्दलीय प्रत्‍याशी अब्‍दुलरहमान व एन होमेंद्रो हैं. उल्‍लेखनीय है कि इनर क्षेत्र के निवर्तमान सांसद डॉ: मैन्‍य इंफाल कॉलेज में गणित के प्राध्‍यापक रह चुके हैं. वह 2002 में कांग्रेस में शामिल हुए. सांसद बनने से पहले वह राज्‍य सरकार में शिक्षा मंत्री थे.
आउटर मणिपुर सीट पर मुख्‍य मुकाबला इंडियन नेशनल कांग्रेस के थोंसा वाइटे और निवर्तमान सांसद व पीपल्‍स डेमोक्रेटिक एलायंस के नेता मनि चरानमै के बीच है. वैसे एनसीपी के एलबी सोना, बीजेपी के लोली अदानि व राजद के चामखोंगम आउकिप भी चुनावी मैदान में हैं. बहरहाल, विकास की दौड में पिछडे मणिपुर को अपने सांसदों से काफी उम्‍मीदें हैं. लोगों को शिकायत है कि अब तक जो भी सांसद बने, उन्‍होंने सांसद निधि पर ही अधिक ध्‍यान दिया. जनता इस बात से अधिक नाराज है कि केंद्र और राज्‍य दोनों जगहों पर कांग्रेस की सरकारों के रहते हुए भी विकास का कोई काम नहीं हो रहा है. लोग अपने मुख्‍यमंत्री ओक्रम इबोबी से भी काफी खफा है. मुख्‍यमंत्री से यह नाराजगी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी भी पड सकती है. वैसे हैरानी की बात यह है कि आउटर और इनर क्षेत्रों के मुद्दे स्‍थानीय होते हुए भी समान नहीं है.जहां तक चुनाव प्रचार की बात है, तो यहां भाकपा नेता एबी वर्धन भी आ चुके हैं. उन्‍होंने पार्टी के उम्‍मीदवार डॉ नर सिंह के लिए जमकर प्रचार किया. कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी भी चुडाचांदपुर में आए थे. एनसीपी प्रत्‍याशी एलबी सोना के लिए पूर्व लोकसभा अध्‍यक्ष पीए संगमा ने भी चुडाचांदपुर में सभा की. जीत के दावे सभी दल और प्रत्‍याशी कर रहे हैं. फिर भी बहुकोणीय मुकाबले में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह कहना फिलहाल कठिन है.





Saturday, 18 April, 2009

पथ धूलि

पथ धूलि हूं मैं
युग-युग कुचलती रही
जन्‍मो-जन्‍मों से
गाली सुन रही
पथ धुली हूं मैं।
बडी आशा के साथ
जाना चाहा गगन में
जगह पावन में
पर, उतरती फिर
धरती पर
ऊंची गाली के साथ।
मैं चाहती हूं तुम्‍हारा पास
तुम्‍हें चाहती, पर तुझसे दूर रहती
पथ धुलि हूं मैं।
युगों के अभिशाप,
जन्‍मों की गाली,
तुम्‍हारा निवास मैदान
बडी धरती, सब
धूल से बने सिर्फ
भूलना नहीं, हमेशा
हमेशा कुचली
पथ धूलि हूं मैं।
चाह नहीं मुक्ति
मांग नहीं शांति
हे मनुष्‍य तुम्‍हारे
चरणों की धूलि बनूं,
तुम्‍हारे लातों कुचली मैं
काम पूरा कर सकूं,
आनंद से हंसूं
हर युग में कुचलती रही
जन्‍मों की गाली सुनती रही
पथ धूलि हूं मैं।

लीला

तूने मारा, मृदंग का ताल
तूने मारी, थापने की आवाज
मेरा मनपसंद ताल है
दो दिन के जीवन में,
चाहत नहीं समझते,
तुम्‍हारी इच्‍छा वहीं है
हर कदम पीछा करूं
भजन-कीर्तन करूं तुम्‍हारे नाम का
दुश्‍मन हजार-हजार आने दो
यदि सिर्फ तुमने हो, तो कुछ नहीं
सारे संकट आने दो
सामना करूं, दो शक्ति
सिर्फ तुम मत आना बचाने,
मुझे सम्‍मान पाने दो
हजारों जुदाई, लाखों तलाक आने दो
उसके लिए आंसू न गिरने दो,
उसके लिए न रोऊं, खाली हंसू
रोऊंगा न मिलने पर
सिर्फ मेरे लिए बने तुम।

Sunday, 12 April, 2009

ओ राही !

ओ राही !
अगर दिल्‍ली जाना।
तो कहना अपनी सरकार से।
चर्खा चलाता है हाथों से।
शासन चलाता है तलवार से।